दोकडो एक कोरिअन द्वीप, और ताकेशिमा एक कल्पित कथा क्यों है?

यह प्रमाण देखिए: सबूतों का एक पहाड़ साबित करता है कि दोकडो हमेशा से ही एक कोरियाई द्वीप रहा है.

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दोकडो पूर्वी समुद्र में एक कोरियाई द्वीप है – ऊल्लंग्डॉ की एक बहन के द्वीप. जापानी सरकार के अनुसार ऐसा कोई सबूत नहीं है कि दोकडो ऐतिहासिक रूप से एक कोरियाई द्वीप रहा है. जापानी अभिकथन के विपरीत, इस बात के ठोस सबूत उपलब्ध हैं कि दोकडो पूर्व-ऐतिहासिक काल से एक कोरियाई द्वीप रहा है.

विषय-सूची


I. दोकडो क्या है?

II. जापानी अभिकथन

III. ताकेशिमा का कोई अस्तित्व नही है!

IV. दोकडो पर कोरियाई मिल्कियत के सबूत

  1. आप दोकडो को ऊल्लंग्डॉ से देख सकते हैं.
  2. कोरियन लोग ऊल्लंग्डॉ पर पूर्व-ऐतिहासिक काल से रहते आ रहे हैं.
  3. शिल्ला नाम के एक कोरियाई राज्य ने उसान-गुक नाम के एक स्थानिक राज्य पर सन् 512 में चढाई कर उसे हरा अपने राज्य में विलीन कर लिया था.
  4. अब यह दोकडो उसी उसान-गुक का हिस्सा है.
  5. कोरियाई सरकार का एक अधिकारिक अभियान सन् 1476 में दोकडो जा चुका है.
  6. पुरातन कोरियाई इतिहास की किताबें सिद्ध करती हैं कि उसान ही दोकडो है.
  7. आह्न यॉन्ग-बॉक की घटना: कोरिअन लोगों ने जापानी घुसपैठिओं को सन् 1696 में खदेडा.
  8. पुराने कोरियाई नक्शे भी यह बताते हैं कि दोकडो कोरिआ का हिस्सा है.
  9. सन् 1836 में जापानी सरकार घोषणा करती है कि दोकडो एक निषिद्ध विदेशी इलाका है.
  10. सन् 1877 में जापानी सरकार दोकडो को तज देती है.
  11. पुरातन जापानी नक्शे साफ बताते हैं कि दोकडो कोरिआ का हिस्सा है.
  12. क्योंकि यह एक रहस्य था, “शिमेन नोटिस” अशक्त है.
  13. दोकडो को सन् 1900 में प्रशासकीय रूप से कोरियाई साम्राज्य में शामिल किया गया.
  14. जापान द्वारा कोरिआ पर सन् 1905 में अधिपत्य स्थापित होने तक दोकडो कोरियाई सरकार द्वारा प्रशासित था.
  15. जापान द्वारा पोट्सडॅम घोषणा का अगस्त 15, 1948 को स्वीकार किए जाने के बाद, अलाईड शक्तिओं का दोकडो का कोरिआ को हस्तांतर भी वैध है.
  16. जापानीओं का दियाओयुताई द्वीपों पर दावे को मानना उनके इस तथ्य को स्वीकार करने पर जायज है कि दोकडो पर कोरियाई अधिकार है.
  17. जापानी कानूनों नें दोकडो को जापानी सरकार के अधिकार-क्षेत्र से बाहर रखा.
  18. अलाईड शक्तिओं के 1951 के संधिपत्र की सभी तरतूदों को मानने का जापान नें वायदा किया.
  19. कोरिआ का दोकडो पर तथ्यतः नियन्त्रण 1948 से रहा है.


V. कौन अधिक विश्वासयोग्य है?


यह लेख इन भाषाओं में भी उपलब्ध है:
अंग्रेजी (English), अरेबिक (العربية), फ्रेन्च (Français), स्पॅनिश (Español), जर्मन(Deutsch), और हिन्दी.

इसके अलावा, “Dokdo Island” शिर्षित एक अन्य लेख दोकडो के विभिन्न पहलुओं का विस्तारपूर्वक वर्णन करता है.

फोटोः अंतरिक्ष से दोकडो का अवलोकन (सूत्रः कोरिआ अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान))



दोकडो (कोरिअन में “독도,” अंग्रेजी में “Dokdo”), जिसे दोकडो द्वीप भी बुलाया जाता है, पूर्वी समुद्र (जापानी समुद्र) में एक द्वीपों का समूह है. इन द्वीपों को सामूहिक रूप से दोकडो कहा जाता है. इस शब्द का अर्थ है एक “पथरीला द्वीप”. जापान द्वारा 1905 से 1945 के बीच कोरिआ के अधिग्रहण के समय को छोडकर, दोडको प्राचीन इतिहास से कोरियाई भूमि माना जाता रहा है.
दोकडो को “लियॅनकोर्ट रॉक्स” भी कहते हैं, यह नाम “ल्यु लियॅनकोर्ट” (Le Liancourt) नामक फ्रेन्च जहाज से पडा, जिसने दोकडो को जनवरी 27, 1849 के दिन खोजा था. 1905 तक दोकडो का जापानी नाम मात्सुशिमा (松島; Matsushima) था, और फिर इसके बाद, जापान के क्षेत्रीय दावे के चलते यह नाम बदल कर ताकेशिमा (竹島; Takeshima) रखा गया.
दोकडो दक्षिणी कोरिआ के अधिकार क्षेत्र में अगस्त 15, 1948 से है, जिस दिन कोरिआ-स्थित अमरिकी XXIV कोर ने नव-निर्मित कोरियाई गणराज्य को दोकडो सौंपा था.

फोटो: दोकडो का स्थान

फोटो: दोकडो – “पक्षिओं का घर”

फोटो: अन्तर्जलीय दृश्य – दोकडो के इर्दगिर्द मछलियों का झुंड


जापानी सरकार कोरिआ के दोकडो पर प्रादेशिक प्रभुसत्ता को चुनौती देती है. जापानी सरकार यह भी आरोप लगाती है कि कोरिअन लोग अवैध तरीके से दोकडो पर कब्जा किए हुए हैं, क्योंकि दोकडो 1905 में ही टेर्रा-नल्लिअस इनकॉर्पोरेशन के तहत जापान का हिस्सा है. और तो और, जापानी सरकार नें विवाद को और भी हवा देने के इरादे से अपने बच्चों को यह भी सिखाना शुरू कर दिया है कि ताकेशिमा (दोकडो) जापान का एक ऐसा क्षेत्र है जिसे कोरअन लोगों ने हथियाया है. अपनी बात को साबित करने के लिए जापानी सरकार ने दावा किया है कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि दोकडो ऐतिहासिक रूप से कभी कोरिआ का था भी! उदाहरण के तौर पर आप जापान के विदेश मंत्रालय की वेबसाईट पढ़ सकते हैं: www.mofa.go.jp/region/asia-paci/takeshima/index.html. शिमेन की जापीनी शासकीय इकाई भी कुछ इसी तरह का दावा करती है (यह साईट देखें: http://www.pref.shimane.lg.jp/soumu/takesima_eng/).
इसके विपरीत, दक्षिणी कोरियाई सरकार का मानना है कि ज्ञात इतिहास के प्रारंभ से दोकडो कोरिआ की मिल्कियत रहा है. कृपया देख http://www.korea.net/ (अंग्रेजी में). ज़ाहिर है, इनमें से एक पक्ष बिल्कुल गलत है. अब कौन सही है और कौन गलत?


“ताकेशिमा” नाम का द्वीप, जिसे जापान ने 1905 में खोजा और अपने अधिकार क्षेत्र में सम्मिलित किया, कभी अस्तित्व में था ही नहीं! यह कैसे हो सकता है? पहले तो जिस द्वीप को जापान “नया” द्वीप करार दे रहा है, वह कभी नया था ही नही, बल्कि कोरियाई इतिहास के प्रारंभ से जाना हुआ है. इस द्वीप को कभी जापान में मात्सुशिमा पुकारा जाता था, और जापान नें बार-बार इस द्वीप को अपना मानने से इन्कार किया क्योंकि उस समय जापान इस द्वीप को कोरियाई द्वीप मानता था. दूसरे, 1905 से पहले ही से, कोरियाई साम्राज्य ने 1900 में एक आधुनिक प्रशासकिय आज्ञप्ति के जरिए दोकडो को अपना एक अभिशासित प्रदेश करार किया था. तीसरे, जापान ऐसा बहाना कर रहा है कि दोकडो के अपने देश के साथ विलिनीकरण का नोटिस उनके देश में कभी जारी हुआ था. जबकि वास्तिविकता यह है कि इस छिपे हुए नोटिस के बारे में तो जापानी नागरिक तक नहीं जानते, कोरअनों की तो बात ही छोडिए.
“ताकेशिमा” यह शब्द दरअसल कोरिआ के एक अन्य द्वीप – “ऊल्लंग्डॉ” – का बिगडा हुआ रूप है. जापानी लोग दोकडो को 1905 तक मात्सुशिमा के नाम से जानते थे. फिर 1905 में एक “शिमेन नोटिस” द्वारा एक नए द्वीप की दन्तकथा रची गई, जो पूर्वी समुद्र के बीचोबीच स्थित था और जिसपर किसी का अधिपत्य नहीं था. “ताकेशिमा” का नाम इस नव-निर्मित रचना को दिया गया, जो कि वास्तव में ऊल्लंग्डॉ का पुराना जापानी नाम है. लेकिन कोरिआ और जापान दोनों ही इस द्वीप के बारे में सदिओं से जानते हैं. इसलिए 1905 में “खोजा गया” “ताकेशिमा” नाम का द्वीप अस्तित्व में नहीं है. ऊल्लंग्डॉ और दोकडो के विभिन्न समयों में विभिन्न नामों की जानकारी नीचे सारणी में दी गई है.
ऊल्लंग्डॉ का कोरियाई नाम दोकडो का कोरियाई नाम ऊल्लंग्डॉ का जापानी नाम दोकडो का जापानी नाम
पंद्रहवीं शताब्दी से पहले मुल्लिउंग (उसान-गुक का) उसान (उसान-गुक का) कोई रिकार्ड नहीं कोई रिकार्ड नहीं

1900 तक

ऊल्लंग्डॉ
उसान

ताकेशिमा
मात्सुशिमा
1900 और 1905 के दर्म्यान उल्डो सिओक्डो, डॉल्सिओम कोई रिकार्ड नहीं कोई रिकार्ड नहीं
1905 के बाद ऊल्लंग्डॉ दोकडो ऊल्लंग्डॉ ताकेशिमा (एक नया द्वीप)

जापानी शब्द “ताकेशिमा” का मतलब है, “बाम्बु द्वीप”. यह मतलब “ऊल्लंग्डॉ” के लिए माएने रखता है, क्योंकि ऊल्लंग्डॉ में बहुत सारे बाम्बु और पेड हैं. मजे की बात यह है कि दोकडो में ना तो कोई बाम्बु है और ना ही कोई पेड! क्योंकि वहां की मिट्टी इतनी पथरीली है कि सिर्फ छोटी झाड़ियां ही उगती हैं. 1905 में यह एक मजाकिया घटना घटी जब दोकडो जैसे बंजर टापू को एक उपजाऊ द्वीप को फबने जैसा नाम दिया गया.
वर्तमान चलन में “ताकेशिमा” यह शब्द एक जापानी कल्पकथा के लिए वाक प्रकार बन गया है, जो कि उनके अनुसार 1905 में खोजे गए एक द्वीप का नाम है. पुराने जापानी और कोरियाई रिकार्डों से यह सिद्ध होता है कि यह द्वीप कोई नया नहीं था. यह नया द्वीप अस्तित्व में नही है! बच्चों की दन्तकथाओं में से एक उक्ति ध्यान में आती है जो यहां बिल्कुल सुसंगत लगती है – के सम्राट तो नंगा खडा है! “ताकेशिमा” तो है ही नहीं!
इतने स्पष्ट रूप से मिथ्या तर्क के बावजूद, जापानी सरकार का दावा है कि ताकेशिमा जापान का है क्योंकि जापान नें उसपर अपना हक पहले जताया, और इस बात का कोई रिकार्ड नहीं है कि इस द्वीप पर कभी कोरियाई सत्ता रही थी. अब क्या ऐसे रिकार्ड हैं भी या नहीं?



दोकडो पर 1905 से पहले कोरियन कब्जा था इस बात के पुख्ता सबूत हैं. जापानी सरकार के आधिकारिक नीति को खण्डन करने के लिए काफी सबूत यहां दिए हैं.

दोकडो और ऊल्लंग्डॉ पर खडे रह कर आप एकसे दूसरे को देख सकते हैं. ऊल्लंग्डॉ में रहने वाला कोई भी व्यक्ति यह जानता है कि दोकडो बाहर जाने पर दिखाई देता है. लेकिन यही दोकडो जापान के किसी भी द्वीप से दिखाई नहीं देता.

बाएं का फोटो:
ऊल्लंगडॉ से दोकडो दिखाई देता है.
(सूत्र – दोकडो केन्द्र)


पूर्व-ऐतिहासिक काल से कोरियाई निवासी ऊल्लंग्डॉ में रहते आए हैं. कोरियाई शैली के तीन शवकक्ष (고인돌; गोईन्डॉल; dolmens), जिनका विन्यास 300 ईसवी-पूर्व से 1 ईसवी शताब्दी के बीच आंका गया है, यहां ऊल्लंग्डॉ में पाए गए हैं. यह कब्रिस्तान प्राचीन कांस्य युग और पूर्व लौह युग के हैं. अकेले कोरियाई प्रायद्वीप में पूरी दुनिया के चालीस प्रतिशत ऐसे कब्रिस्तानों के अवशेष मौजूद हैं. बाकी के ऐसे कब्रिस्तानों में बहुतांश मंचुरीआ में स्थित हैं, जो कि किसी जमाने में गोजोसिओन (고조선; Gojoseon ; लगभग 2333 ईसवी-पूर्व से लेकर 108 ईसवी-पूर्व) नामक पुरातन कोरियाई राज्य का हिस्सा रहा था. इन विशिष्ट कब्रिस्तानों से यह सिद्ध होता है कि ऊल्लंगडॉ में उस जमाने में कोरियाई लोग निवास करते थे. और अधिक पुरातत्व जानकारी के लिए आप http://blog.dokdo.korea.com/?page=2 देख सकते हैं.
उपरस्थित फोटो: कोरियाई कब्रिस्तान का एक उदाहरण.
ऊलसान, कोरिआ के बांगुडे (반구대; Bangudae) में स्थित शिलाओं पर खुदे चित्रों में व्हेलिंग जहाजों की तसवीरें हैं जिनमें बीस नाविक समाविष्ट हो सकते हैं. अगर प्राचीन काल में कोरियाई लोग जहास से ऊल्लंगडॉ जाकर रह सकते थे, भले ही वे ऊल्लंग्डॉ आंखों से न देख पाते थे, तो अवश्य ही ऊल्लंग्डॉ पहुंच कर वे दोकडो के लिए रवाना तो हो ही सकते थे, जो कि उन्हें ऊल्लंग्डॉ के द्वीप से साफ दिखायी देता होगा.

बांया फोटो –
विद्वानों का मानना है कि बांगुडे में पाए गए शिला-चित्र निओलिथिक युग और पूर्व लौह-युग में समय के अंतराल में खुदे हैं.







दोकडो का पहला उल्लेख एक कोरियाई इतिहास की किताब में पाया जाता है, जिसका शिर्षक है – “सामगुक सागी” (삼국사기, 三國史記; Samguk Sagi; जिसका अर्थ है तीन राज्यों का इतिहास), और जिसका संकलन 1145 ईसवी सदी में हुआ. इस किताब के अनुसार, शिल्ला के सेनानायक ईसाबु नें “उसान-गुक” पर चढाई कर उसपर विजय पाई, और उसान-गुक में “ऊल्लंग्डॉ” और “दोकडो” शामिल होने का जिक्र है.

बांया फोटोः ईसवी 512 में ईसाबु किम की मुहिम

उपर्युक्त फोटोः सामगुक सागी का एक पन्ना, जिसमें कोरियाई राज्य शिल्ला द्वारा “उसान-गुक” पर हमले और पराजय का वर्णन है.
सन् 1454 में छपे “सिजॉन्ग शिल्लॉक जिरिजी” (Sejong Shillok Jiriji) के पुरातन कोरियाई रिकार्ड के अनुसार, उसान-गुक में दो टापू शामिल हैं – मुल्लंग और उसान. इस रिकार्ड के अनुसार यह दो द्वीप इतनी दूरी पर स्थित हैं कि एक द्वीप से दूसरे द्वीप को सिर्फ तभी देखा जा सकता है जब आसमान साफ हो. पूर्वी समुद्र में सिर्फ ऊल्लंग्डॉ और दोकडो ही ऐसा जोडा है जो कि इस वर्णन में फिट बैठता है.

बांया फोटोः एक और रिकार्ड, “गोर्यिओसा” (고려사; 高麗史; Goryeosa; “गोर्यिओ का इतिहास”) जिरिजी (भूगोल विभाग), जो कि सन् 1451 में छपा था, में भी “सिजॉन्ग शिल्लॉक जिरिजी” के सन् 1454 के अंक जैसा ही वर्णन है.


राजा सिऑन्गजॉन्ग के समय के दस्तावेज़ एक अभियान का जिक्र करते हैं, जो सन् 1476 में दोकडो गया था. इस दस्तावेज़ में दोकडो, सॅम्बॉन्गडॉ के नाम से सम्बोधित हुआ है.

बांया फोटोः जा-जू किम के पार्टी की सन् 1476 में सॅम्बॉन्गडॉ जाकर लौटने के रास्ते की अनुमानित पुनर्रचना.


कुछ कोरियाई इतिहास की किताबें दोकडो की मिल्कियत का विस्तृत वर्णन करती हैं. ग्यिओन्ग-जुन शिन द्वारा सन् 1756 में लिखित “बॉर्डर इतिहास” (강계고; 疆界考; Border History) नामक इतिहास की किताब में कोरियाई क्षेत्र के ऐतिहासिक सीमाओं का वर्णन है. इसका एक संबंद्धित परिच्छेद यहां प्रस्तुत हैः

मेरी समझ में यिओजिजी (여지지; 輿地志; Yeojiji; नोटः इस किताब की कोई वर्तमान आवृत्ति उपलब्ध नहीं है) में दिया गया वृतान्त सही है, जहां ऐसा लिखा है – ‘हालांकि कुछ मूर्ख लोग कहते हैं कि ऊल्लंग्डॉ और उसान एक ही द्वीप हैं, लेकिन कई नक्शों के अभ्यास से यही नतीजा निकलता है कि वास्तव में यह दो अलग द्वीप हैं. इनमें से एक को जापानी लोग सॉन्ग्डॉ के नाम से जानते हैं (송도; 松島; जापानी में मात्सुशिमा). यह दोनों द्वीप उसान-गुक (于山國) में शामिल हैं.'”

अन्य कोरियाई इतिहास की किताबें जो दोकडो पर कोरियाई मिल्कियत बताती हैं, वह हैः सन् 1808 का मान्गी योराम (만기요람; 萬機要覽; Mangi Yoram), सन् 1823 का पूर्व का इतिहास (해동역사; 海東繹史; History of the East), और सन् 1907 का रिवाईझ्ड ऍन्साईक्लोपिडीआ ऑफ रिकार्ड्स (증보문헌비고; 增補文獻備考; Revised Encyclopedia of Records).

सन् 1696 की आह्न यॉन्ग-बॉक की घटना दोकडो पर कोरिया की अनन्य प्रभुसत्ता जतलाती है. यॉन्ग-बॉक आह्न ऊल्लंग्डॉ का स्थानीय निवासी था, जिसने जापानी मछुआरों को कोरिआ के अधिकार क्षेत्र में अवैध रूप से घुसने से सन् 1693 और 1696 में रोका था. ठीक उसी तरह, जैसे किसी घर का मालिक अपने घर में बिन-बुलाए लोगों को बाहर खदेड देता है. राजा जिऑन्गजो के समय के दस्तावेजों के अनुसार (1776-1800), यॉन्ग-बॉक आह्न के इस कार्य का ही फल था कि कोरियाई सरकार ने हर तीन साल के अन्तराल पर जांचकर्मियों की टीम को ऊल्लंग्डॉ और गाजिडॉ (दोकडो) भेजना शुरू किया, यह देखते रहने के लिए कि कहीं कोई जापानी कार्यवाही तो नहीं हो रही. यहां फिर से दोनो द्वीपों का जिक्र होता है.

बांया फोटोः आह्न यॉन्ग-बॉक घटना पर मान्गी योराम से एक पन्नाः “यॉन्ग बॉक ने उनका सॉन्गडॉ तक पीछा किया और उन्हें फिर फटकारा. ‘सॉन्गडॉ उसान्डो है. क्या तुम्हें ज्ञात नहीं कि उसान्डो हमारी भूमि है?’ फिर उसने एक बडी लाठी के जरिए उनके खाना बनाने के मटके को फोड दिया. जापानी लोग डर के मारे भाग खडे हुए. यॉन्ग-बॉक बेक्गी-जू (伯耆州; Baekgi-Ju; शिमेन स्थानीय प्रशासन) गया और अपनी दास्तान (वहां के सरकारी अफसरों को) सुनाई. गवर्नर नें उन्हें (जापानी नाविकों को) सज़ा दी.”

बांया फोटोः एक जापानी दस्तावेज़, जिसे ओकी द्वीप के एक स्थानीय अफसर ने तयार किया. यह दस्तावेज़ सन् 1696 में आह्न यॉन्ग-बॉक घटना के तुरन्त बाद तयार किया गया. इसमें लिखा है – “चोसुन के आठ मंडलः ग्यॉन्ग्गी मंडल, गान्गविऑन मंडल – इस मंडल में हैं ताकेशिमा और मात्सुशिमा, जिऑन्ला मंडल, चुन्गचिऑन्ग मंडल, …”

बांया फोटोः आह्न यॉन्ग-बॉक की घटना के बाद तोकुगावा शोगुनात (मतलब जापानी सरकार) नें चोसुन की सरकार (मतलब कोरिआ) को सन् 1697 में पत्र द्वारा सूचित किया कि उन्होंने अपने नागरिकों पर ऊल्लंग्डॉ जाने की पाबंदी लगा दी है. हालांकि दोकडो का इस पत्र में सीधा उल्लेख नहीं है, लेकिन दोकडो की भी इस पाबंदी में शामिली गृहीत थी क्योंकि दोकडो ऊल्लंग्डॉ “की मिल्कियत में आता था”. जापानी सरकारी की पाबंदी की घोषणा के बाद की अमलीकरण की कार्यवाहीओं से भी यह साफ हो जाता है कि दोकडो इस पाबंदी का हिस्सा था.


यों तो दोकडो को कोरियाई अधिकार क्षेत्र में दिखाने वाले नक्शे बहुत सारे हैं, यहां पर सिर्फ दो नमूने दिए जा रहे हैं.
8.1 सन् 1846 का डेई-ग्युन किम द्वारा कार्टे डी ला कोरीई

बांया फोटोः कार्टे डी ला कोरीई (Carte de la Corée), कोरिया का नक्शा जो डेई-ग्युन किम नें सन् 1846 में पूरा किया. यह नक्शा यूरोप पहुंचा, और फिर बाद के कई युरोपीय नक्शों के लिए नमूना बना. मूल नक्शा फ्रेन्च में तयार किया गया था, जिसमें ऊल्लंग्डॉ को “औलांग्तो” और दोकडो को “औसान” लिखा गया. “औसान” उसान (우산, 芋山) का फ्रेन्च लिप्यंतरण है.
8.2 जियॉन्ग-हो किम द्वारा सन् 1861 में तयार किया गया “डेइडॉन्ग यिओजिडॉ”

बांया फोटोः कोरिआ के एक उच्च विभेदन नक्शे की प्रति, “डेइडॉन्ग यिओजिडॉ” (대동여지도; 大東輿地圖; Daedong Yeojido), जो “जियॉन्ग – हो किम” (김정호) द्वारा सन् 1861 में छापा गया था और 1997 में जापानी संसद के पुस्तकालय में पाया गया था पता चलता है, जिसमें दोकडो को आरेखीय रूप से दर्शाया गया है.

आह्न यॉन्ग-बॉक की घटना के बाद से जापानी सरकार नें विदेशी देशों की जहाज यात्रा पर रोक लगा दी. बाद की एक घटना में ऍझुया हॅशीमॉन नामक एक हौसलाबंद जापानी नवयुवक (會津屋八右衛門 ; あいずやはちえもん; Aizuya Hachiemon, 1798 – 1836) ऊल्लंग्डॉ की ओर एक माल-वाहक जहाज ले जाते हुए पकडा गया. इस युवक पर मुकदमा चला, और बाद में उसे मौत की सज़ा हुई. ऍझुया हॅशीमॉन की सुनवाई के वक्त जापानी सरकार नें यह स्पष्ट किया कि दोकडो और ऊल्लंग्डॉ भी जहाज-यात्रा पर पाबंदी में शामिल हैं.

उपर का बांया फोटोः ऍझुया हॅशीमॉन की सुनवाई के बाद शोगुनात द्वारा ज़ारी फरमान.
उपर का दांया फोटोः ऍझुया हॅशीमॉन की जहाज़-यात्रा का नक्शा जो शोगुनात फरमान के साथ जोडा गया.



इस बात की खातिर-जमा करने के लिए कि ऊल्लंग्डॉ अथवा दोकडो की यात्रा पर पाबंदी लगाई गई है, शिमेन स्थानीय प्रशासन के नेता मात्सुदैरा हामादा (松平浜田; Matsudaira Hamada) ने सन् 1838 में “ओहेसुझेबॉनझान्गु” (御解書御諸本帳; オヘソオゼボンザング; Ohesoozebonzangu) शिर्षित एक चार-पन्ने का आदेश-पत्र जारी किया. सभी गांवों के नेताओं से अपेक्षित था कि वे यह आदेश-पत्र पढें और आखिरी पन्ने पर अपनी अभिस्वीकृति के रूप में हस्ताक्षर करें.

बांया फोटोः ऍझुया हॅशीमॉन की सुनवाई के निपटारे के बाद जारी सार्वजनिक नोटिस का पहला पन्ना, जिसमें ऊल्लंग्डॉ और दोकडो के प्रवास पर प्रतिबंध का जिक्र है.

बांया फोटोः सार्वजनिक नोटिस का अंतिम पन्ना. सभी गांवों के नेताओं के सील उनके नामों के साथ में दिखाई देते हैं.




एक निर्णायक सबूत सन् 1877 में जारी जापान के उस समय के सर्वोच्च सरकारी प्राधिकार के आदेश से मिलता है. दाएजोकान (太政官; Daijokan) द्वारा जारी इस आदेश में, जिसे दाएजोकान आदेश (太政官指令; Daijokan order) के नाम से जाना जाता है, यह स्पष्ट उल्लेख है कि ऊल्लंग्डॉ और दोकडो का जापान से कोई लेना-देना नहीं है, यानि कि दोकडो एक कोरियाई क्षेत्र है. इस आदेश को 1877 का कोबुन्रुको (公文録; Kobunruko) दस्तावेज़ (मतलब सरकारी दस्तावेज़) भी कहा जाता है.
ऊपरी फोटोः सन् 1877 का दाएजोकान दस्तावेज़. 
“ताकेशिमा और पूर्वी समुद्र में स्थित एक अन्य द्वीप के भूकर-मानचित्र के संकलन को लेकर हुई पूछताछ के बारे मेः

शिमेन स्थानीय प्रशासन नें हमें ताकेशिमा के क्षेत्राधिकार को लेकर पूछताछ की थी. मंत्रालय मामले पर गौर करने के बाद इस नतीजे पर पहुंची है कि गेन्ररोकु के नौवे वर्ष (नोट: 1696) के पहिले महिने में बनाए गए दस्तावेज़ों के मुताबिक कोरिअनों के इन द्वीपों में हुए प्रवेश के बाद, इन द्वीपों का हमारे देश से कोई संबंध नहीं है. इन दस्तावेजों में शामिल हैं:
1. भूतपूर्व सरकार के विचार-विमर्श का अभिप्राय,
2. सरकारी दुभाषिया अनुवादक द्वारा जारी अधिसूचना,
3. संबंधित देश का शासकीय पत्र, और
4. हमारे देश का जवाब और रिपोर्ट.
दूसरे शब्दों में, गेन्ररोकु के बारहवें साल तक, लेखपत्रों का आदान-प्रदान पूरा हो गया था. तथापि, किसी भूखंड का अधिग्रहण अथवा परित्याग एक अत्यंत महत्वपूर्ण मामला है, हम इस प्रश्न पर आपकी ओर से सूचनाओं का अनुरोध करते हैं और मामले के सभी दस्तावेज़ प्रस्तुत करते हैं. 
मार्च 17, मेइजी का दसवां वर्ष, 
कार्यकारी गृह मंत्री ओकुबो तोशिमिची
उप-गृह मंत्री मेइजिमा हिसोका
उदैजिन (नोट: दाएजोकान के सर्वोच्च तीसरे आधिकारिक) इवाकुरा तोमोमी:
ताकेशिमा और एक अन्य द्वीप से संबंधित पूछताछ को लेकर, आप ठीक से समझ लें (心得) कि उन द्वीपों का हमारे देश से कोई लेना-देना नहीं है.
मार्च 29, मेइजी का दसवां वर्ष ”

ऊपरी फोटोः सन् 1877 के दाईजोकान दस्तावेज़ों के साथ जुडा हुआ नक्शा. ऊल्लंग्डॉ (“磯竹島”) और दोकडो (“松島”) ओकी द्वीप के नीचे दांई ओर दर्शाए गए हैं. दोकडो का नाम और भौतिक विशेषताएं उसकी शिनाख्त करती हैं.


अठहारवीं सदी क पहले के सभी जापानी नक्शों में दर्शाया गया दोकडो एक कोरियाई क्षेत्र के रूप में ही दर्शाया गया है, और ऐसा अलग रंग अथवा साथ में टिप्पणी देकर, अथवा ऊल्लंग्डॉ की उसकी करीबी दिखाकर किया गया है.

बांया फोटोः
“चोसुन देश के पूरे नक्शे के तांबे का प्रिन्ट”, जिसे सन् 1882 में जापान में छापा गया. जहां जापान के सभी क्षेत्रों को एक रंग दिया गया है, वहीं ऊल्लंग्डॉ और दोकडो इस रंग से बाहर रखे गए हैं, जिससे यह पता चलता है कि ऊल्लंग्डॉ और दोकडो कोरियाई क्षेत्र जाने जाते थे.
जापान द्वारा कोरिआ पर हुकूमत के समय (1905-1945) तयार किए गए नक्शे भी यह कबूल करते हैं कि दोकडो जापान के हूकूमत से पहले कोरिआ का हिस्सा था.

बांया फोटोः
“भूमि सर्वे विभाग जिल्ला सारांश नक्शा” (陸地測量部發行地圖區域一覽圖(其一)), जो जापानी कमान द्वारा सन् 1936 में प्रकाशित हुआ, में यह जतलाया गया है कि दोकडो एक ऐसा क्षेत्र है जो मेइजी के सन् 1867 के पुनर्निमाण के बाद हासिल किया गया.


जापान का आरोप है कि सन् 1905 के शिमेन स्थानीय शासन नोटिस नं 40 ने दोकडो को अपने क्षेत्र में सम्मिलित किया क्योंकि दोकडो उस समय किसी की सम्पत्ति नहीं थी. इस नोटिस के मुआएने से पता चलता है कि यह एक गोपनीय दस्तावेज़ था जिसकी नकल उतारने की मनाही थी. फिर भी जापान का आरोप है कि इस गोपनीय दस्तावेज़ की केवल एक प्रति होने के बावजूद यह “नोटिस” का काम कर सकती है. साथ ही, ध्यान दें कि इस कथित नोटिस एक स्थानीय सरकार केवल द्वारा, नहीं, बल्कि जापान के केंद्रीय सरकार द्वारा जारी किया गया था.
जापानी आरोपों के समर्थकों का कहना है कि इस “नोटिस” पर एक लेख एक स्थानीय समाचार पत्र में (परन्तु किसी भी राष्ट्रीय समाचार पत्र में नहीं) शिमेन प्रान्त के भीतर प्रकाशित किया गया था पर ज़ोर देना. लेकिन क्यों किसी विदेशी सरकार को एक स्थानीय समाचार पत्र में एक अस्पष्ट लेख करने के लिए ध्यान देना चाहिए? निश्चित रूप से, जापानी सरकार ने कहा कि सभी विदेशी सरकारों सभी प्रांतीय समाचार पत्र में लिखा जापानी जमा करना चाहिए और उन्हें हर एक दिन का विश्लेषण, प्रस्ताव नहीं किया जा सका.
कौनसा नोटिस? और किसे? यह “शिमेन नोटिस” एक कानूनी नोटिस नहीं हो सकती.

ऊपरी फोटोः शिमेन नोटिस नं 40 की इकलौती मूल प्रति
“शिमेन प्रिफॅक्चर नोटिस नं 40
यह द्वीप जो ऊत्तरी लॅटिट्युड़ 37° 9′ 30″, पूर्वी मेरिडिअन 131° 55′, ओकी द्वीप से 85 नॉटिकल मील उत्तर-पश्चिम पर स्थित है, उसे ताकेशिमा के नाम से जाना जाएगा, और यह द्वीप ओकी द्वीप के गवर्नर के आधिकारिक क्षेत्र में होगा.

फरवरी 22, 1905
क्षेत्रीय गवर्नर बुकिची मात्सुनागा”
लाल सील “इसकी प्रति मत निकाले, सिर्फ सर्कुलेशन के लिए


फोटो के ऊपर हैं: इस कोरियाई साम्राज्य का इम्पीरियल अध्यादेश संख्या 41 के मूल दस्तावेज (25 अक्टूबर 1900)


बांया फोटोः इम्पिरिअल ऑर्डिनेन्स नं 41 – इम्पिरिअल ऑर्डिनन्स नं 41 का प्रकाशन, जो कोरियाई साम्राज्य के सरकारी गॅझॅट में छपा थाः

“इम्पिरिअल ऑर्डिनेन्स नं 41
नाम का “ऊल्लंग्डॉ” से “ऊल्डो” को परिवर्तन, और द्वीप के संचालक (“दोगॅम”) के पद का नाम बदलकर जिल्ला गवर्नर (“गुन्सु”)

आर्टिकल 1. ऊल्लंग्डॉ का नाम बदलकर ऊल्डो होगा. …;
आर्टिकल 2. जिल्ले के दफ्तर का स्थान सामचुडॉन्ग (ऊल्लंग्डॉ का एक छोटा प्रान्त) होगा, जिल्ले के दफ्तर का अधिकार क्षेत्र ऊल्लंग्डॉ का पूरा द्वीप (ऊल्लंगजुन्डॉ, मतलब ऊल्लंग्डॉ और आसपास के छोटे-छोटे द्वीप), जुकडॉ और सिओकडॉ (मतलब दोकडो) होगा;
आर्टिकल 3. …
अक्टुबर 25, 1900
इम्पिरिअल हस्ताक्षर (सम्राट के हस्तलेख के साथ सील), इम्पिरिअल सील. जिऑन-हाह ली, कॅबिनेट, स्टेट डिविशन, अस्थाई प्रधानमंत्री आन्तरिक मामलों के सचिव, द्वारा प्रस्तुत और संचालित”

बांई ओर का चित्रः ऊल्लंग्डॉ, जुकडॉ औ सिओक्डॉ के स्थान, आकाश से देखे जाने पर. दोकडो इस चित्र की सीमा से बाहर है (इन द्वीपों से 87.4 कि.मी. दूर होने के कारण).


इम्पिरिअन ऑर्डिनेन्स नं 41 के जारी होने के बाद कोरियाई सरकार दोकडो को उल्डो जिल्ले के प्रशासन के अधीन मानती थी, यह बात मार्च 29, 1906 के जिल्ला गवर्नर ह्युन्ग-ताएक शिम के रिपोर्ट से मालूम पडती है. सन् 1905 में एक स्वतन्त्र देश के रूप में अपना दर्जा खो चुकने के बाद कोरिआ जापान का एक प्रोटेक्टोरेट हो गया था. 1945 तक, जब तक कोरिआ पर जापानी शासन का अन्त नहीं हुआ, कोरिअन दोकडो को लेकर कुछ नहीं कर सकते थे. जो हो, इस रिपोर्ट से यह साबित होता है कि कोरिआ की स्वप्रभुसत्ता जापान द्वारा सन् 1905 में छीने जाने तक दोकडो कोरियाई सरकार के ताबे में था.

उपर का फोटोः अप्रैल 29, 1906 के रिपोर्ट की प्रति, जिसे जिल्ला गवर्नर ह्युएन्ग-ताएक शिम ने गॅन्गविऑन्डॉ के प्रॉविन्शिअल गवर्नर को लिखा था.
दोकडो (獨島; Dokdo) हमारे जिल्ले (本郡) के प्रशासन में है, यह द्वीप बाहरी समुद्र में 100-कुछ री (लगभग 40 कि.मी.) पर स्थित है. … जापानी अफसरों के एक दल नें हमारे शासकीय दफ्तर को भेंट दी और कहा अब जब कि दोकडो जापान का हिस्सा बन चुका है, हम उसका मुआयना करने आए हैं. यह घटना मैं (ह्युएन्ग-ताएक शिम, उल्डो का जिल्ला गवर्नर) आपको सूचित करने लिए रिपोर्ट कर रहा हूं. भवदीय ...

डिसम्बर 1, 1943 की कैरो घोषणा के अनुसारः:

जापान को हर उस इलाके से खदेड दिआ जाएगा जो उसने हिंसा और लालच में आकर हथियाया है.

जुलै 26, 1945 के पोट्सडॅम घोषणा के अनुसा:

कैरो घोषणा की सभी शर्तों को पूरा किया जाएगा और जापानी प्रभुत्व को होन्शु, होक्काएडो, क्युशु, शिकोकु और ऐसे कुछ छोटे द्वीपों तक सीमित रखा जाएगा, जिसे हम तय करेंगे.

जापान नें इन शर्तों पर अपनी रजामन्दी दिखाई जब उसने अगस्त 15, 1945 के दिन अलाईड शक्तिओं के समक्ष बिना-शर्त घुटने टेक दिए. जापान का सितम्बर 2, 1945 की समर्पण की घोषणा कहती है:

हम, …, जापानी सरकार एवं जापानी इम्पिरिअल जनरल हेडक्वॉर्टर्स, पोट्सडॅम में … जारी घोषणा को स्वीकार करते हैं.

अमरीकी XXIV कोर ने अलाईड शक्तिओं के सभी देशों के प्रतिनिधी के रूप में अगस्त 15, 1948 के दिन दोकडो को नवनिर्मित कोरिअन गणराज्य के अधीन किया. दोकडो को कोरियाई सरकार को हस्तांतर करने की क्रिया द्वारा अलाईड शक्तिओं ने यह तय किया की दोकडो जापानी प्रभुसत्ता में शामिल नही है. जापान द्वारा ऑगस्त 15, 1945 के पॉट्सडॅम घोषणा के स्वीकरण की वजह से अलाईड शक्तिओं का दोकडो का कोरिआ को हस्तांतरण वैध हो जाता है, क्योंकि दोकडो का हस्तांतरण अलाईड शक्तिओं द्वारा जापानी अधिकार क्षेत्र की सीमाओं के निर्धारण का भाग था. इस क्रिया द्वारा अलाईड शक्तिओं नें अपनी बात जतलादी है, और उनका निर्णय आज भी लागू है. अलावा इसके, एक बार दोकडो को कोरिआ के अधीन करने के बाद, चाहे वह जिस भी वजह से किया गया हो, कोरिआ दोकडो का स्वामी है और जापान उसपर अपना हक नहीं जतला सकता.

16. जापान का दियाओयुताई द्वीपों पर के हक को मानने के लिए उनको मानना होगा कि दोकडो एक कोरियाई क्षेत्र है.

दियाओयुताई के द्वीप ( 釣魚台群島; 钓鱼台群岛; Diaoyutai islands), जिन्हें जापान सेनकाकु द्वीप (尖閣諸島; Senkaku Islands) के नाम से भी जानता है, दरअसल द्वीपों का एक समूह है जिनपर, अमरीका द्वारा जापान को प्रशासकीय हस्तांतरण के तहत, जापान का कब्जा है. तायवान दियाओयुताई के द्वीपों पर अपना हक जता रहा है, और चीनी गणराज्य उनपर अपना हक जता रहा है.

उपर का फोटोः दोकडो और दियाओयुताई के द्वीप के स्थान और हस्तांतरण का इतिहास

क्या जापान इस दावे को लेकर वास्तव में संजीदा है कि अमरीका का कोरियाई गणराज्य को दोकडो का हस्तांतरण वैध नहीं है? यदि दोकडो का कोरिआ को हस्तांतरण वैध नहीं है, तो फिर दियाओयुताई के द्वीप का जापान को हस्तांतरण भी वैध नहीं है, और नतीजतन जापानीओं का दियाओयुताई के द्वीपों पर कब्जा गैरकानूनी है! दियाओयुताई के द्वीपों पर अपना हक जमाए रखने के लिए जापानी सरकार को यह मानना होगा कि कोरिआ को दोकडो का हस्तांतरण कानूनी है. नहीं तो जापान को चाहिए कि वह दियाओयुताई के द्वीपों को तायवान और चीन को सौंपने के लिए बातचीत तुरंत शुरू कर दे!

17. जापानी कानूनों ने जापानी सरकार के अधिकार क्षेत्र से दोकडो को बाहर ही रखा.

दूसरे महायुद्ध के बाद में भी और अगस्त 15, 1948 को कोरियाई गणराज्य की स्थापना के बाद भी, जापान द्वारा पारित कई कानूनों में दोकडो को जापानी क्षेत्र से बाहर माना गया. उदाहरण के तौर पर, जून 6, 1951 को जारी और जुलै 8, 1960 को पारित “प्रधान मंत्री के ऑफिस के ऑर्डिनेन्स नं 42 ” के अनुसारः

आर्टिकल 2. इस ऑर्डिनेन्स के आर्टिकल 14 की तरतूदों के तहत, जब कॅबिनेट के ऑर्डर नं 291, आर्टिकल 2, क्लॉझ 1, सब-क्लॉझ 2 लागू करते हैं, तब निम्नलिखित द्वीप छूट जाते हैः

… 3. ऊल्लंग्डॉ, जेजु द्वीप, और ताकेशिमा; …

जापानी कानून का एक अन्य उदाहरण जहां पर जापानी सरकार के अधिकार क्षेत्र से दोकडो को बाहर रखा गया है, वह है “वित्त मंत्रालय की डिक्री नं. 4“, जो फेब्रुवारी 13, 1951 को जारी हुआ और जून 26, 1968 को पारित हुआ. ऐसे सभी कानून जापान में आज डिसम्बर 5, 2008 में भी लागू और वैध हैं! जापानी सरकार ने घोषणा की कि जापान के कानून सूची में दिए गए द्वीपों पर लागू नहीं होते, और इनमें दोकडो शामिल है. कम से कम, यह तो साफ होता है कि दोकडो कि कभी भी जापानी क्षेत्र नहीं माना गया, जैसा कि जापानी हक के कुछ गण मानते हैं.

जापान के साथ सुलहनामा (जिसे “सॅन फ्रान्सिसको का सुलहनामा” भी कहा जाता है) अलाईड शक्तिओं के 49 देश और जापान के बीच सितम्बर 8, 1951 को तय किया गया था, और जो अप्रैल 28, 1952 को अमल में लाया गया.

सुलहनामे के आर्टिकल 19 (डी) के अनुसारः

(डी) जापान अधिग्रहण के समय अलाईड शक्तिओं द्वारा किए गए सभी कार्यों को, अधिग्रहण के अधिकारिओं द्वारा दिए गए सभी निर्देशों को, और उस समय के जापानी कानूनों को जापान मान्यता देता है, और जापान अलाईड शक्तिओं के नागरिकों के विरूद्ध उनके द्वारा किए गए किसी भी कार्य के विरूद्ध कोई दीवानी अथवा फौजदारी मुकदमा नहीं करेगा.

कोरिआ-स्थित अमरीकी XXIV कोर ने सुलहनामे के बहुत पहले, अगस्त 15, 1948 के दिन दोकडो को नव-निर्मित कोरियाई गणराज्य के हाथ सुपुर्द किया था. दोकडो का कोरिआ को हस्तांतरण या तो जापान पर हावी “अधिग्रहण अधिकारिओं” के सक्रिय समर्थन से हुआ, अथवा इन्हीं “अधिग्रहण अधिकारिओं” की एक निष्क्रिय भूल द्वारा हुआ. जो भी हो, जापान शान्ति के सुलहनामे को अतिक्रमण करके दोकडो पर अपना हक नहीं जता सकता.

19. कोरिआ का दोकडो पर सन् 1948 से तथ्यतः कब्जा है.

जापान के कोरिआ को दोकडो के हस्तांतरण की मान्यता में न सिर्फ यह शामिल है कि उनका अगस्त 15, 1948 के प्रथम हस्तांतरण को लेकर कोई विरोध नहीं था, बल्कि यह भी बात शामिल है कि उनका कोरियाई वायु संरक्षण अभिनिर्धारण मण्डल (KADIZ) की स्थापना को लेकर कोई एतराज़ नहीं था, जिसकी नींव अलाईड शक्तिओं के शासन के समय अमरीकी वायु दल के पॅसिफिक कमान नें 1950 में रखी थी. एक बार फिर, यह घटना जापान के साथ हुए शान्ति के सुलहनामे पर हस्ताक्षर के समय घटी थी.

बांया फोटोः कोरियाई युद्ध की शुरूआत के समय जून 1950 में प्रकाशित एक यू.एन. और KADIZ की अमरीकी सेना द्वारा तयार किया गया नक्शा. दोकडो का स्थान साफ-साफ दर्शाया गया है.

बांया फोटोः सन् 1987 का एक अमरीकी वायु दल का नक्शा. कोरियाई वायु संरक्षण अभिनिर्धारण मण्डल (KADIZ) और जापानी वायु संरक्षण अभिनिर्धारण मंडल के बीच की सीमारेषा बहुत साफ-साफ निर्धारित की गई है. दोकडो को लाल वृत के मध्य में दर्शाया गया हौ, जो कि KADIZ की सीमा के बहुत भीतर है.


सबूतों के इतने संचयन के बावजूद जापानी सरकार कोरिआ के दोकडो पर 1905 से पहले के मिल्कियत को नकार करता आता है. अपरिहार्य है कि लेखक के प्रत्यय और कोरियाई सरकार के प्रत्यय जापानी सरकार के प्रत्यय बीच तौल हो.
एक तरफ आप लेखक के क्रिडेन्शिअल्स की जांच-पडताल कर सकते हैं. लेखक का जीवन कोई गोपनीय नहीं है. लेखक को दक्षिण कोरियाई सरकार के किसी कपट-पूर्ण कार्यों के बारे में पता नहीं है. अगर किसी को दक्षिण कोरियाई सरकार के किसी भी संदिग्ध अथवा अनैतिक कामों के बारे में पता हो जिससे एक बडा अंतर्राष्ट्रीय बवाल खडा हो सकता है, तो वे ऐसी घटनाएं सामने लाएं ताकि दक्षिण कोरियाई सरकार की सही तस्वीर दिख सके.
दूसरी ओर, जापानी सरकार के रिकार्ड कोई इतना साफ-सुथरे प्रतीत नहीं होते. दूसरे महायुद्ध के समय “कम्फर्ट विमेन ” के साथ जबरन वेश्याचार करवाए जाने के आरोप का जापानी सरकार जुलै 30, 2007 तक खंडन करते आई. उस दिन अमरीका के हाऊस ऑफ रिप्रेझेन्टेटिव्स् ने एक प्रस्ताव, नं 121, पास किया जिस का मुद्दा यह था कि “जापान इस घटना को औपचारिक रूप से कुबुल कर, मुआफी मांगे, और साफ और स्पष्ट रूप से इस घटना की ऐताहसिक जिम्मेदारी अपने सर ले.”
युनिट 731, एक जापानी सेना की युनिट जो 1937 से 1945 तक मन्चुरिआ में स्थित थी, ने 10,000 से भी ज़्यादा इन्सानों पर जीवच्छेदन किया. यह घटना भी जापानी सरकार ने बहुत अरसे तक छिपा कर रखी. और जापानियों नें कोरिआ पर 1905 और 1945 के बीच में अपने शासन के दौरान वे कहते हैं कि मिल सकता है सभी कोरियाई इतिहास की किताबें को जब्त कर उन्हे जला दिया, ताकि कोरियाई पहचान ही मिट जाए.
जहां जापानी इतिहास की किताबें हिरोशिमा और नागासाकी पर हुई ऍटमिक बमबारी की वजह से हुई जापानी जीवितहानी (लगभग 170,000 से लेकर 260,000 लोग) का विस्तृत ब्यौरा देती हैं, वहीं यह किताबें इम्पिरिअल विस्तार के समय जापान द्वारा की गई नृशंसता को लेकर चुप्पी साधे हैं, जिसकी वजह से जापानी जनता दूसरे देशों सहन किए अत्याचार के बारे में अनभिज्ञ है. उदाहरण के तौर पर, “नानकिंग का बलात्कार (南京)”, अथवा नानकिंग नरसंहार, जिसमें लगभग 150,000 से 300,000 चीनी असैनिक नागरिकों का वध हुआ, का या तो उपरी-उपरी तौर पर जिक्र होता है, या फिर उल्लेख ही नहीं होता.
आज भी जापानी नेतागण यासुकानी पुण्यस्थान (靖国神社) को भेंट देते हैं, ताकि दूसरे महायुद्ध के युद्ध अपराधिओं का राष्ट्रीय हिरो के रूप में गौरव कर सकें. प्रलय इनकार जर्मनी में एक अपराध है. फिर भी, युद्ध अपराधियों को जापान में सम्मानित कर रहे हैं! क्या आप कल्पना कर सकते एक जर्मन चांसलर हिटलर की कब्र का दौरा? फिर भी हम एक जापानी समकक्ष है! तुम कहाँ ईमानदारी और सिद्धांत देखते हैं?

यदि आप इस केस के जज होते, तो किस पक्ष की बात पर विश्वास करते – कोरियाई पक्ष अथवा जापानी पक्ष?
यह लेख Dokdo Island शिर्षित पूरे लेख का सारांश है. आपकी इच्छानुसार उस लेख में पूरा वाकया आप पढ सकते हैं.
परिशिष्टः पूर्वी समुद्र के बारे में
इस लेख के अन्त में एक और नोटः
दोकडो पूर्वी समुद्र (“ईस्ट सी”; the East Sea) के मध्य में स्थित है. इस समुद्र को जापानी लोग उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक “चोसुन (कोरिआ) का समुद्र” (“सी ऑफ चोसुन”; 朝鮮海) कह कर पुकारते थे. उन्नीसवी शताब्दी के मध्य तक जापानिओं को जापानी समुद्र (“सी ऑफ जापान”; 日本海) का मतलब “पॅसिफिक” हुआ करता था. जब पूरी दुनिआ नें “दी पॅसिफिक” इस नाम को स्वीकार कर लिया, तब जापानिओं नें “सी ऑफ जापान” का नाम चोसुन के समुद्र को दे दिया. अब बताइए, किसने किसी और का समुद्र हथिया लिया?

एक जापानी नक्शा, 1830 में प्रकाशित, “सी ऑफ चोसुन (朝鲜海), अर्थात्,”कोरिया के समुद्र दिखाता है.

का नाम “दी ईस्ट सी” प्रथम पर प्रलेखित था कि “के स्मारक गोगुर्येओ के राजा, ग्वान्गेतो” वर्ष 414 में.

इस के स्मारक गोगुर्येओ के राजा, ग्वान्गेतो शब्द “दी ईस्ट सी”(東海) दिखाता है.

“सी ऑफ जापान” यह नाम सिर्फ पिछले 150 सालों से इस्तेमाल में है. अलावा इसके, “सी ऑफ जापान” यह नाम अन्तर्निहित अन्याय है क्योंकि इस नाम से ऍसा प्रतीत होता है कि यह समुद्र जापानी मिल्किअत में है. “नॉर्थ सी” को “सी ऑफ ब्रिटेन” अथवा “सी ऑफ नॉरवे” नहीं कहते, हालांकि यह देश नॉर्थ सी की सीमा पर हैं. और नार्वे सागर उत्तर सागर शामिल नहीं है.
इरान और सौदी अरेबिया के बीच की खाड़ी को “पर्शिअन गल्फ” कहते हैं, “इरानिअन गल्फ” नहीं. इस खाड़ी को “अरेबिअन गल्फ” भी कहते हैं. नाम पढकर ही समझ में आता है कि इरान पर्शिअन गल्फ का मालिक नहीं है. इस प्रकार, बहरीन में नहीं किया जा सकता है कि “इरानिअन गल्फ”.
परन्तु यदि कोरिआ और जापान के बीच के समुद्र को “सी ऑफ जापान” कहते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानों इस समुद्र में मौजूद सभी द्वीपों पर जापान का अधिकार है.

ऐसे हालातों में “दि ईस्ट सी” ज़्यादा उचित और निष्पक्ष नाम है. “सी ऑफ जापान” यह नाम बदल कर “ईस्ट सी” यह नाम रखा जाना चाहिए, ताकि ईस्ट सी के इर्दगिर्द बसे देशों के हितों का नुकसान ना हो, और जो दोनो कोरिआ, रशिआ और जापान की सीमाओं से लगे हैं. हम यहां “सी ऑफ कोरिआ” इस नाम पर चर्चा नहीं कर रहे. जब कोई व्यक्ति दोकडो के बारे में यह सुनता है कि यह “सी ऑफ जापान” में स्थित एक द्वीप है, तब उसके जहन में पहला भाव यह आता है कि यह द्वीप शायद जापान के कब्जे में हो, क्योंकि यह तो सी “ऑफ जापान” में स्थित है. और जापान इसी निष्कर्ष का फायदा उठा कर दोकडो पर अपना हक जतला रहा है. प्रिय पाठक, आप यहां एक काम अवश्य कर सकते हैं. यहां से आगे कृपया “सी ऑफ जापान” के बजाय “दि ईस्ट सी” इस नाम का अपनी भाषा में प्रयोग करें. यदि किसी नाम का प्रयोग किसी पार्टी के प्रति अन्याय करे, तो वह नाम गलत नाम है. इसलिए, “दि ईस्ट सी” यह नाम लागू होना चाहिए, ताकि न्याय हो.


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“दोकडो कोरिया पर जापानी आक्रमण का पहला शिकार था. दोकडो हमारी छाती को हमारी स्वतंत्रता के साथ वापस आ गया है. दोकडो कोरियाई स्वतंत्रता का प्रतीक है. छू यह द्वीप पूरी कोरियाई लोगों के प्रतिरोध के लिए जो भी तैयार रहना चाहिए! दोकडो है ही नहीं कई चट्टानों, पर हमारे लोगों के सम्मान का लंगर है. हम कैसे दोकडो खोने के बाद हमारी स्वतंत्रता की रक्षा कर सकता! इस जापानी प्रयास दोकडो लेने के लिए कोरिया के खिलाफ उनकी आक्रामकता की बहाली का मतलब है.”

जुलाई 8, 1953 डा. येओंग-ते ब्येओं, कोरिया के गणराज्य के विदेश मंत्री.


फोटो ऊपर: “योंग – गी मून” (문용기; 1878 – 1919) की रक्तरंजित जैकेट. 4 अप्रैल 1919 पर, “योंग – गी मून” इरी, कोरिया में एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन का नेतृत्व किया, और कोरिया की स्वतंत्रता की मांग की. जब वह अपने दहिने हाथ में एक कोरियन ध्वज के साथ “कोरियाई स्वतंत्रता सदैव!” चिल्लाया, जापानी सैन्य पुलिस उसका दाहिना हाथ काट दिया. जब वह अपने बाएँ हाथ से झंडा उठाया और चिल्लाया “कोरियाई स्वतंत्रता सदैव!” फिर भी एक बार, जापानी सैन्य पुलिस उसके बाएं हाथ काट दिया. जब वह उसकी बाहों के छोड़ा क्या था उठाया और “कोरियाई स्वतंत्रता सदैव!” फिर चिल्लाई, जापानी सैन्य पुलिस उसके दिल में एक तलवार जोर. आज, सभी जीवित कोरियाई एक बार फिर से चिल्लाओ – “कोरियाई स्वतंत्रता सदैव!”